वो बचपन भी कितना सुहाना था, जिसका रोज एक नया फसाना था । कभी पापा के कंधो का, तो कभी मां के आँचल का सहारा था। कभी बेफिक्रे मिट्टी के खेल का, तो कभी दोस्तो क…